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कैसे कह दूंँ कि इंतज़ार नहीं

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// कैसे कह दूंँ कि इंतज़ार नहीं // और जब फ़िराक़ ने कहा होगा कि - 'तेरे आने की क्या उमीद मगर, कैसे कह दूंँ कि इंतज़ार नहीं' तो उनका दिल कितना डूबा रहा होगा। उमीद न होने के बावजूद इंतज़ार करने की क़ुव्वत दिमाग़ में नहीं है। ऐसी तवक़्क़ो इश्क़ में सने हुए - डूबे हुए दिल से ही की जा सकती है।  दरअस्ल उमीदी और ना उमीदी दिमाग़ के सब्जेक्ट्स हैं, दिल का इनसे कोई वास्त: नहीं। दिन शुरू होते ही, किसी का इंतज़ार इस यक़ीन से करना कि बस वो आता ही होगा और दिन ख़त्म होने पर इस यक़ीन के साथ आँखें मूंदना कि कल तो आ ही जाएगा - यह दिल की टेरिटरी में ही मुम्किन है। यानी दिल के पास 'यक़ीन ' ही इकलौता सब्जेक्ट है। दिमाग़ के हवाले से सोचें तो बड़ी बचकानी हरकत मालूम होती है और दिल के हवाले से देखें तो लगता है कि अभी भी कोई कमी रह रही है। फ़िराक़ यह शे'र कहते हुए जिस जगह रहे होंगे, मैं भी कई बार अपने आप को वहीं पाता हूंँ।  इस शे'र में 'मगर' से लेकर 'नहीं' तक एक अजब दुनिया बसती है। 'मगर' दिल का सबसे पसंदीदा लफ़्ज़ है। 'मगर वो आ भी सकता है', ...